Book Review: Marxwaad ka Ardhsatya; Anant Vijay पुस्तक समीक्षा: मार्क्सवाद का अर्ध सत्य – अनंत विजय

यही होता है जब हिंदी किताब उठा लेता हूँ मैं, हिंदी पढ़ने का सूरूर इस तरह हावी हो जाता है की फिर अंग्रेज़ी किताब छूट जाती है पीछे…नैचरल ज़ुबान सही में होती है कुछ चीज़। सो पालतू बोहीमीयन के बाद ये किताब उठा ली। ख़रीदी थी काफ़ी पहले, पर अभी तक पढ़ना बाक़ी था। अनंत विजय जी ने मार्क्सवादियों के दोहरे चरित्र को अच्छा बेनक़ाब किया है। वैसे पुस्तक का दायरा काफ़ी व्यापक है, विजय जी ने आज हो रहे साहित्य सृजन, साहित्यकारों का आपसी व्यमनस्य, पुराने और नए साहित्यकर्मियों का आपसी रिश्ता, साहित्य और आलोचना, लेखक और बाज़ार का सम्बंध, लेखनी की समग्रता और रेलवन्स को ‘इज़म’ के मानदंड पे तौलने की रीत इन सभी पे अच्छा कुठाराघात किया है।

वैसे मुझे किताब अच्छी लगी पढ़ने में, पर किताब को बेहतर तरीक़े से एडिट किया जा सकता था। कई चैप्टर में एक ही बात कई बार दोहराई गयी है, जो ऊबाउ सा लगता है। अंत में वही बात कहूँगा जो चो रमस्वामी ने मार्क्सवाद के परिपेक्ष में भारत के लिए कहा था, “If left has any future in India, India has no future left!’

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