भारतीय दर्शन और सेकुलरिज्म

अपने Watsapp समूह में आज एकक मित्र इस बाबत मुझसे बिफर पड़े जब मैंने ये लिख दिया ‘The current definition of Indian secularism is divorced from the genius of this soil. भारतीय सेकुलरिज्म की परिभाषा भारतीय दर्शन से परे की ही नहीं जा सकती, जो बात नेहरू जी नहीं समझ सके थे’. बस क्या था  कर उन्होंने लिखा की ये हिंदूवादी सब का rhetoric है, Genius of soil क्या होता है, क्या है भारतीय दर्शन?  सब soil एक ही होता है, दर्शन वर्शन रूढ़िवादी विचार है, scientific temper  की बात कीजिये. हम कुछ बोले नहीं, बेकार था बहस करना, सो बस एक स्माइली मार के छोड़ दिए!.

तो क्या वाक़ई इस देश की मिटटी में कोई जीनियस है के नहीं और और भारतीय दर्शन के बिना भारत में सेकुलरिज्म की सही अवधारणा की भी जा सकती है? मैं जब भी इस्लाम या क्रिश्चियनिटी के बारे में पढता हूँ तो एक बात दिमाग में हमेशा counter-factual के तरह कौंध जाती है की फ़र्ज़  कीजिये अगर प्रोफेट मुहम्मद का जन्म उस समय के भारतवर्ष में हुआ होता, तो क्या उनकी ज़िन्दगी की कहानी वही होती? क्या इस्लाम का स्वरुप वही होता? क्या उनको इसलिए कौशाम्बी से मगध (मतलब एक example दे रहा हूँ) रात के अँधेरे में हिज़रत करना पड़ता क्योंकि वो एक अलग तरह की विचारधरा या मज़हब (जो नाम उसका देना चाहें, आप दें) को फैलाना चाह रहे थे? इस देश की परंपरा ने तो भाई हर धर्म गुरु छोड़िये, हर किसी को खुल कर अपनी बात कहने की इज़ाज़त दी, चाहे वो किसी को पसंद आये या नहीं, किसी भी established विचार से मेल खाये या उसके विरोध में खड़ा हो जाये. किसी ने भगवान बुद्ध को अपनी बात रखने पर हिज़रत करने पे मज़बूर नहीं किया. क्या आप सोच सकते हैं की भारतवर्ष में किसी गैलेलिओ को इस बात पे फांसी की सजा सुनाई जाती की उन्होंने ये कह दिया की धरती सूर्य की परिक्रमा करती है? उसी तरह अगर इसा मसीह भारतवर्ष में जन्मे होते तो क्या उनको इसलिए सलीब पे चढ़ा दिया जाता की वो ये बोल रहे हैं की वो ईश पुत्र हैं? अरे, यहाँ तो उनको भी कुछ नहीं किया गया, (बल्कि इज़्ज़त से ही नवाज़ा गया) जिन्होंने अपने आप को ईश  पुत्र तो क्या ‘अहम ब्रह्मास्मि’ की घोषणा कर खुद को ही ईश कह डाला. लेकिन मेरे लेफ्टिस्ट लिबरल मित्रों को फिर भी अपनी भारतीय परम्पराओं में सेकुलरिज्म नहीं दीखता, पिछड़ापन दीखता है.

अब चलिए थोड़ा और कल्पना की उड़ान लागते हैं … मान लीजिये अगर प्रोफेट मुहम्मद की पैदाइश भारत में होती और उनको divine revelation भी यहीं मिलता, और फिर वो उसके प्रचार प्रसार के लिए निकलते तो फिर क्या होता? मेरे हिसाब से तो यह देश न सिर्फ उनको स्वीकारता, वरन उस विचारधारा को भारतीय दर्शन में उच्च स्थान देता जैसा की यहाँ जन्मे अन्य धर्मों के साथ हुआ. भारतीय धर्मगुरु शायद अपने सूत्रों में प्रोफेट के विचारों की व्याख्या कुछ इस तरह कर रहे होते;  ‘निराकार अद्वैतवाद’ के दर्शन में एक और शक्तिशाली धारा का उद्भव हुआ है, जो पूर्ण अद्वैतवाद नहीं है, और इंसान के स्वर्ग की प्राप्ति को उसके कर्म से जोड़ती है, सो निराकार अद्वैतवाद और कर्म मार्ग का समायोजन है ये विचार.. .हाँ, थोड़ी पूजा पद्यति में भिन्नता है, वो साल में एक महीने उपवास करना पड़ता है, दिन में पांच बार मन्त्र जाप है, और मन्त्र जाप करते समय उठना बैठना पड़ता है, गरीबों का ध्यान रखने के लिए अपने कमाई का कुछ हिस्सा गरीबों में बांटना पड़ता है आदि आदि!  उसी तरह येसु के विचारों की व्याख्या प्रेम मार्गी धारा का एक अंश कह कर की जाती। मतलब सब इस भारतीय दर्शन का हिस्सा मान लिए जाते, भारतीय दर्शन उनको पूरी तरह अपना बनाकर अपने में समाहित कर लेती, जैसा की अन्य सभी मतों और विचारधाराओं के साथ हुआ जो इस sacred geography में जन्मीं। 

दिक्कत यही है की हमने जो सेकुलरिज्म की अवधारणा की है उसका फ्रेमवर्क भारतीय दर्शन और उसकी समग्रता के विपरीत पाश्चात्य experience पे मबनी  है. चूँकि भारतीय दर्शन के परंपरा में किसी के  ‘othering ‘ की कोई जगह नहीं है (सब कुछ उसी ब्रह्म का एक अंश है), धर्म (जो भारतीय सन्दर्भ में रिलिजन हीं है, वरन कंडक्ट है ) या दर्शन को व्यक्तिगत (private) domain  में restrict करने की कोई ज़रुरत नहीं है. सेकुलरिज्म की जड़ें इस देश में गहरी करनी हों तो उस समग्र समावेशी भारतीय दर्शन का प्रचार बढ़ाने  की ज़रुरत है, न की उसे private domain में सिमित करने की, जैसा पश्चायत्य सेकुलरिज्म करता है. वो अब करे भी तो क्या? पश्चिम  जिसमे सारे मज़हब सेमिटिक थे, और जिनका प्रिंसिपल आइडियल ही अपने मज़हब को न मानने वाले को ‘other’ की संज्ञा देना था, उसे अगर सामाजिक सद्भाव चाहिए था तो बिना रिलिजन को प्राइवेट डोमेन में बाँध देने के चारा क्या था? भारतीय दर्शन में कोई भी वर्ग ‘condemned’ नहीं है, जिसकी नियति में नरक जाना लिखा ही हो क्योंकि वो किसी एक सेमिटिक मज़हब में विश्वास नहीं रखता, ये ज़िम्मेदारी किसी भी मताबलम्बी पे थोपी नहीं गयी है की बाकि ‘condemned’ लोगों को कन्वर्ट करो और उनका उद्धार करो.  ये भारतीय दर्शन कोई बुद्धिजीवियों के ‘हाई फलसफा’ वाली बात नहीं है, बल्कि ये भारत के आम जनमानस में पूरी तरह समाहित हो चुकी है. आप किसी गांव  के सबसे अनपढ़ और गरीब व्यक्ति से भी ये पूछ कर देखें की वो जो हिन्दू देवी देवताओं को नहीं मानते, क्या  निश्चित ही नरक जायेंगे, तो १० में कम  के कम ९ व्यक्ति आपको यही जवाब देगा की ‘ये तो उसके कर्म पे निर्भर है, जैसा काम करेगा, वैसा ही फल मिलेगा’.

दूसरी समस्या जो आयी है ये वेस्टर्न सेकुलरिज्म को अपनाने से वो भाषा, lexicography की है. विदेशी कांसेप्ट की भाषा  विदेशी ही होगी. अब इस शब्द को लीजिये, जो खूब प्रचलित है अभी, ‘Toleration’; inter community संबंधों को डिफाइन करने के लिए मुझे इससे घटिया शब्द नहीं दीखता. मतलब एक दुसरे को ‘बर्दास्त’ करना। कितना नेगटिव शब्द है! कहीं आपने भारतीय दर्शन परंपरा में ये सुना या पढ़ा है की भाई क्या करें, अब बौद्ध हो गए हैं लोग तो उनको ‘बर्दास्त’ करना ही पड़ेगा, या फिर जैन हो गए हैं तो उनको बर्दास्त करना ही पड़ेगा? ये ‘बर्दास्त’ शब्द सेमिटिक मज़हब के ‘फ्रेम ऑफ़ रिफरेन्स’ से ही आ सकता है जहाँ आप उनको, जो आपके मज़हब नहीं मानते, उनको ‘धिम्मी’ बना कर उन्हें ‘बर्दास्त’ करते हैं, उनको कभी अपना नहीं मानते. ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ के दर्शन वाले ‘बर्दास्त’ नहीं करते, सब को अपना मान कर उनको ‘accept’ करता हैं . Indian civilizational ethos had no concept of tolerance, but acceptance.

ये सेकुलरिज्म की परिभाषा और लेफ्टिस्टों की दी हुई शिक्षा पद्यति के दो बेहद अफ़सोसनाक परिणाम निकले हैं. एक तो अपनी सभ्यता और दर्शन से कटने के कारण हिन्दुओं में एक ऐसा ‘सेमिटिक’ तपका  खड़ा हो गया है जो न सिर्फ अपने दर्शन के समग्रता और उद्दात्तता से अनभिज्ञ है बल्कि  सोशल मीडिया में ‘विराट हिन्दू’ बनकर कहर मचा रहा है. यहाँ तक की वो अपने पूज्यों तक को नहीं छोड़ रहा. अभी अभी जिस तरह की बातें स्वामी विवेकानंद के बारे में कुछ लोग लिख रहे थे, उसके बारे में क्या कहा जाये?  पर आप लगा दिए हैं आर्टिकल ३०, अब हिन्दू अपने दर्शन को जानना चाहे तो जाने कहाँ से? गूगल बाबा से?

दूसरी तरफ हैं वो जो माइनॉरिटी का ठप्पा लगा के घुमते हैं. हर समय ये शिकायत की हमारी ‘आइडेंटिटी’, हमारी ‘शकाफत’ पे खतरा है. भाई अब थोड़ा unpopular संवाद कर लें….ऐसी आपकी कौन सी एक्सक्लूसिव आइडेंटिटी हैआपकी, कौन से शकाफत है, जो मेरी या अन्य हिन्दुस्तानियों की भी नहीं है? पैजामा पे कॉपीराइट चाहिए की टोपी पर? बिरयानी पे की कबाब पर? हुज़ूर, भूल जाइये, नहीं मिलेगी. आपकी नहीं बची है वो , हिंदुस्तानी हो गयी है. पैजामा कुरता पहन के जाओ अरब मुल्क़ों में और बोलो मुस्लिम ड्रेस पहना हूँ, दौड़ा के मारेगा अरब, बोलेगा तुम इंडियन ड्रेस पहने हो, मुस्लिम ड्रेस तो वो है जो मैंने पहना है. अब आप आओगे उर्दू पर…. वाह मियां, उर्दू की परीक्षा पास करने के लिए पढोगे गोपीचंद नारंग, और ठोकोगे उसपे अपना कॉपीराइट? गोपीचंद जी ने क्या इस्लाम क़बूल कर लिया था? मतलब हज़ारों भाषा इस देश में उपजीं, सब पर सब का अधिकार, आप उसमे से एक ज़बरदस्ती चुनके अपनी बना लोगे? हम लोग जो उर्दू पढ़ रहे हैं, वो ऐसे ही, पराए लोग… आपके मज़हब मानने वाले ज़्यादा तादाद में करते होंगे इस्तेमाल, लेकिन जैसे एक ज़मीन जिसपे पहले एक मकां  हो, पर बाद में उसे बिल्डर तोड़ कर मल्टी स्टोरीड बिल्डिंग बना दे, तो फिर उस पे उन सारे फ्लैट वालों का हक़ हो जाता है, वो ओरिजिनल ज़मीन वाले का खली नहीं रह जाता, वैसे ही अब आपकी सारी चीज़ हिंदुस्तान में सभी की हो गयी है।

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